रो रहा क्यों व्यर्थ रे मन
कौन अपना है यंहा पर .
मिट गयी हस्ती बड़ों की
है हमारी क्या यंहा पर .
सबको अपनी ही पड़ी है
चल रहे सब भावना में
स्वप्न सब बिखरे पड़े जब
है कान्हा कुछ कल्पना में . .
स्वर्ग-सुख के मोह में आ
नरक में मैं बस गया हूँ .
आज जग के जाल में कुछ
बेतरह मैं फंस गया हूँ . .
नाव तो मंझधार में फंस
धार की आश्रित हुई है
दूर दोनों तट हुए है
और मंजिल खो गयी है .
कौन देगा साथ मेरा
यह प्रबल चिंता सताती . .
मैं अकेला हो गया हूँ
अब नहीं विश्वास थाती . .
11 comments:
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कौन देगा साथ मेरा
यह प्रबल चिंता सताती . .
मैं अकेला हो गया हूँ
अब नहीं विश्वास थाती . .
चिन्ता तो आदमी की दुश्मन है अगर देखा जाये तो आजकल सभी अकेले हैं-- सब अपनी अपनी दुनियां मे मस्त। कविता मे मन के अन्त्र्दुअन्द को बहुत अच्छे से लिखा है आभार्
अकेला हो गया हूँ ..भ्रमित मनोदशा का अच्छा खाका खींचा है ...पर आपने वो सुना है न कि डूबी अपनी कश्ती बस वहाँ पर , बस जहां सामने था किनारा...बस मन को तो यही विश्वास रखना चाहिए कि दो कदम पर ही है मंजिल ...
अति सुंदर
manobhav ka darshan bahut achha hua hai,behad pasand aayi rachana.
सुन्दर
अकेले होकर भी दुकेले होने का भ्रम हो जाता है...
ati sundar.....
Interesting....
:नाव तो मंझधार में फंस
धार की आश्रित हुई है
दूर दोनों तट हुए है
और मंजिल खो गयी है .:
अति सुंदर
Khoobsurat likha hai.Magar tanhai ka malal kaisa.Jaha tak koi sath hai accha aur jo chala gaya use bhool ja.Amhad faraz sb, ka sher hai
TAMAM UMR KAHAN KOI SAATH DETA HAI
MEIN JANTA HOON MAGAR THODI DOOR SATH CHALO
Tanhai to khud ek duniya hoti hai. Tanha hone ka gam door karen.Aao bhai acchi smirtyon ke gale lag kar jeyen.
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